विवरणम् : संस्कृत धातुओं के रूप दो तरह से चलते हैं । परस्मैपद व आत्मनेपद में । कुछ धातुएँ केवल परस्मैपदी, कुछ केवल आत्मनेपदी और कुछ उभयपदी होती हैं । क्रिया का फल किसी और को प्राप्त हो तो परस्मैपदी व कर्ता को स्वयं प्राप्त हो तो आत्मनेपदी धातुओं का प्रयोग होता है ।