ऋग्वेद
ऋचाओं अर्थात् देवताओं की स्तुतियों अथवा उनके प्रति गाई प्रार्थनाओं का वेद; यजुस्‚ सामन् और अथर्ववेद से यह प्राचीन है और इन तीनों का आधारभूत है ।
the rigveda is earliest collection of prayers addressed to the various gods. it is divided into ten books called mandalas and the number of hymns in this veda is 1017, or if the 11 supplementary hymns called valakhilya inserted in the middle of the 8th book, are added, 1028. the number of hymns mandalawise is: first 191, second 43, third 62, fourth 58, fifth 87, sixth 75, seventh 104, eighth 103, nineth 114, tenth 191. the largest number of hymns are in praise of indra and agni. the rest are addressed to mitra etc. as shown in hindi. mandalas 2-6 are homogeneous. the first, eighth and tenth mandalas are not homogeneous as they are not the productions of a single family of seers. the ninth book stands quite apart, as it is addressed to soma alone. comparative religion, comparative mythology and comparative philology, all viewed together, indicate about 3000 bc. as the date of compilation of the rigveda.
पर्यायः : ऋक्संहिता
उदाहरणम् : ऋचति
विवरणम् : ऋच् स्तुतौ । ऋग्वेद में १० मण्डल हैं और १०१७ सूक्त; यदि आठवें मण्डल में आये बालखिल्य सूक्तों को सम्मिलित कर लिया जाए तो सूक्तों की समष्टि १०२८ बन जाती है । सूक्तों का विभाग यों है : प्रथम मण्डल में १९१‚ द्वितीय में ४३‚ तृतीय में ६२‚ चतुर्थ में ५८‚ पंचम में ८७‚ षष्ठ में ७५‚ सप्तम में १०४‚ अष्टम में १०३‚ नवम में ११४ व दशम में १९१ । इनमें सबसे अधिक सूक्त इन्द्र एवं अग्नि की स्तुति में हैं; अन्य सूक्तों में आते हैं : मित्र‚ वरुण‚ अश्विन्‚ ऋभु‚ मरुत्‚ अर्यमन्‚ पूषन्‚ रुद्र‚ सूर्य‚ विश्वेदेवाः‚ सोम‚ उषस्‚ दंपती‚ विद्वांसः‚ द्यावापृथिवी‚ अन्न‚ बृहस्पति‚ आदित्य‚ सरस्वती‚ राका‚ सिनीवाली‚ अपांनपात्‚ शकुन्त‚ नदी‚ पर्वत‚ वाक्‚ रथांगनी‚ दधिक्रा‚ क्षेत्रपति‚ पर्जन्य‚ पृथिवी‚ आपः‚ वास्तोष्पति‚ विष्णु‚ यजन्य‚ यम‚ पितृ‚ द्यूत‚ मन‚ आवर्तन‚ ज्ञान‚ अदिति‚ ग्रावन्‚ विश्वकर्मन्‚ मन्यु‚ सूर्याविवाह‚ पुरुष‚ उर्वशी‚ हरि‚ ओषधयः‚ देवाः‚ दक्षिणा‚ सरमा‚ धनान्नदान‚ आत्मन्‚ प्रजापति‚ वेन‚ रात्रि‚ भाववृत-सूक्तानि‚ सपत्नीवाधन‚ अरण्यानी‚ श्रद्धा‚ अलक्ष्मीघ्नसूक्तानि‚ शची‚ राजयक्ष्मघ्न‚ यक्ष्मनाशन‚ दुःस्वप्ननाशन‚ सपत्रन्न‚ गावः‚ राजा‚ मायाभेद‚ तार्क्ष्य‚ यजमान‚ त्वष्टृ‚ धाता और संज्ञान । ऋग्वेद के निर्माणकाल का निर्णय कठिन है किन्तु भाषा‚ धर्म‚ पुराण आदि के सार्वत्रिक विकास काे ध्यान में रखते हुए एवं ऋग्वेद में प्रदर्शित तथा ईरान आदि में प्रचलित अग्निदेव के प्राधान्य को दृष्टि में रखते हुए कहा जा सकता है कि ऋग्वेद का प्राकट्य ३००० ई.पू. से भी पर्याप्त पहले हो चुका था ।
शब्द-भेद : संज्ञा, पुं.
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